पहाड़ की मिठाई अरसा का महत्व, स्वयं सहायता समूह की महिलाओं का अरसा को रोजगार से जोड़ने का प्रयास

 

पहाड़ के गढ़वाल मंडल में हर शुभ कार्यक्रम में अरसा जिसे कलैयो भी कहते है का बड़ा महत्व है। शादी-विवाह हो या फिर जब लडकी अपने मायके आती है तो अधिकतर लोग इसे मिठाई स्वरूप देते हैं। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को अरसे को रोजगार से जोड़ने के प्रयास में लगे पवित्र लीला बाल वाटिका संस्थान के अजय प्रकाश बडोला ने बताया है कि अरसा का प्रचलन हजारों वर्ष पूर्व से है,जब शंकराचार्य केदारनाथ मंदिर निर्माण के लिए आए थे तो उस दौरान वे अपने साथ अरसा बना कर लाये थे। उन्होंने बताया कि यही अरसा बाद में गढ़वाल में एक मुख्य मिठाई के रूप में प्रचलित हो गई। अरसा चावल, गुड़,तिल से बनाया जाता है जो एक बहुत ही पौष्टिक आहार भी है और काफी लंबे समय तक यह पकवान खराब भी नहीं होता है।
उन्होंने बताया कि उत्तरकाशी में महिला सहायता समूह की बहनों को प्रोत्साहन देने के लिए वे स्वयं अपने बडोला गिफ्ट सेंटर में अरसा को मार्केटिंग देने का प्रयास कर रहे है और इसमें सफलता भी मिल रही है। उन्होंने बताया कि अब तक दस हजार रुपये से अधिक के अरसा बिक चुका है। अरसा की कीमत 250 रुपये प्रति किलो इसमें लगने वाली सामग्री व महिलाओं के मेहनताना के एवज में रखी गई हैं। श्री बडोला ने बताया कि माँ कालिका गायत्री स्वयं साहायता समूह, पवित्रा लीला सहायता समूह की बहन कुमारी अर्चना, नेगी,गीता देवी के द्वारा अरसा रोटाना बनाया जा रहा है जो कि लोगों को पसंद आ रहा है। इसके अलावा महिलाएं चौलाई के लड्डू,होली के दौरान गुजिया व नमकीन आदि भी बना रही हैं। इसके अलावा इन्हें बनाने का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा जा सके। श्री बडोला ने सरकार से इसके वितरण आदि के लिये योजना बनाए जाने की आवश्यकता बताई।

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