वनाग्नि व आगामी मानसून को लेकर डीएम के अधिकारियों को निरंतर सतर्क व पूरी तरह तैयार रहने के निर्देश

 

जिलाधिकारी डॉ.मेहरबान सिंह बिष्ट ने वनाग्नि व मानसून को लेकर आगामी एक पखवाड़े को काफी चुनौतीपूर्ण बताते हुए सभी विभागों व अधिकारियों को निरंतर सतर्क व पूरी तरह से तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। जिलाधिकारी ने वनाग्नि नियंत्रण में सभी विभागों को तत्परता से सहयोग करने तथा सड़कों के निकटवर्ती गिरासू पेड़ों को चिन्हित कर गिराए जाने की कार्रवाई को तेजी से अंजाम देने की अपेक्षा करते हुए कहा कि वनाग्नि नियंत्रण व जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपायों के लिए विभागों को आर्थिक संसाधनों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी।
जिलाधिकारी ने आह्वान पर वनाग्नि नियंत्रण को लेकर जिले के तमाम वन प्रभागों, वन निगम, पुलिस, फायर सर्विस, एसडीआरएफ, एनडीआरफ के अधिकारियों सहित उप जिलाधिकारियों व खंड विकास अधिकारियों की एक वर्चुअल बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में वनाग्नि की घटनाओं एवं रोकथाम की कार्रवाईयों का ब्यौरा रखने के साथ ही अधिकारियों ने वनाग्नि नियंत्रण से संबंधित अनुभवों व सुझावों को पेश किया। बैठक में वनाग्नि के लिए समूचे वन क्षेत्र के लगभग 30 से 40 फीसदी हिस्से तक फैले चीड़ वनों को अत्यधिक संवेदनशील बताते हुए कहा गया कि पिरूल और लीसा के कारण अधिकांश वन क्षेत्रों में आग फैलने की घटना देखने में आई है। प्रायः आग की शुरूआत सिविल क्षेत्रों, खेतों व सड़कों से लगी जगहों से ही होती है। चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों से युक्त मिश्रित में वनाग्नि की घटनाएं अत्यधिक कम देखी गई हैं। बैठक में वनाग्नि की रोकथाम के लिए सड़कों व आबादी से सटे इलाकों में एक निश्चित दूरी तक चीड़ को हतोत्सहित कर चौड़ी पत्ती की प्रजाति का वृक्षारोपण करने तथा लीसा विदोहन न किए जाने का सुझाव भी प्रमुखता से रखा गया।
बैठक में जिलाधिकारी डॉ. मेहरबान सिंह ने कहा कि इस बार मानसून में देरी की वजह से वनाग्नि संभावना की अवधि लगभग एक सप्ताह और बढ गई है तथा वन क्षेत्र निंतर आग की चपेट में आते जा रहे हैं। वनाग्नि से प्रभावित क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में भूक्षरण एवं भूस्खलन होने की संभावना बनी रहती है। जिससे मानसून की शुरूआत में जिले में काफी चुनौती पेश आ सकती हैं। लिहाजा वनाग्नि रोकने के लिए अपनी पूरी सामर्थ्य और संसाधन जुटाए जाने जरूरी है। मानसून के शुरूआती दौर में भी अत्यधिक सतर्क रहकर किसी भी प्रकार की स्थिति से निपटने के लिए अभी से एडवांस प्लानिंग कर तैयार रहना होगा।
जिलाधिकारी ने वनाग्नि नियंत्रण के लिए वन विभाग, आपदा प्रतिक्रिया इकाईयों व फायर सर्विस के सहयोग हेतु राजस्व व ग्राम्य विकास विभाग सहित अन्य विभागों को भी तत्पर रहने व जरूरत पड़ने पर सीधी कार्रवाई में उतरने को कहा। सभी उप जिलाधिकारी, तहसीलदार और खंड विकास अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों में वनाग्नि नियंत्रण में सहयोग की जिम्मेदारी देखेंगे। इस काम में स्थानीय लोगों का भी सहयोग लिया जाएगा। जिलाधिकारी ने वनाग्नि नियंत्रण के लिए तात्कालिक तौर पर आवश्यक संसाधनों की तुरंत व्यवस्था करने के निर्देश दते हुए कहा कि इसके लिए संबंधित विभागों व संगठनों को जरूरी धनराशि उपलब्ध करा दी जाएगी। उन्होंने वनाग्नि नियंत्रण के दौरान कार्मिकों के लिए उपयुक्त जूते व अन्य उपकरणों के साथ ही पेयजल व खाने की व्यवस्था करने की भी अपेक्षा की।
जिलाधिकारी ने वन विभाग व वन निगम के अधिकारियों को जान-माल के लिए खतरे की संभावना वाले गिरासू पेड़ों को सुरक्षित गिराने की कार्रवाई जल्द पूरा करने के निर्देश देते हुए कहा कि यात्रा मार्गों व अन्य सभी प्रमुख सड़कों पर यह कार्य प्राथमिकता से पूरा किया जाय। वनों के अंदर मौजूद गिरासू पेड़ों को भी अन्य वृक्षों व जीवों की सुरक्षा के दृष्टिगत गिराए जांय। जिलाधिकारी ने कहा कि जान-माल की सुरक्षा के लिए पेड़ों को गिराने की ऐवज में वन निगम को होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई जिला प्रशासन द्वारा की जाएगी।
जिलाधिकारी ने वनाग्नि की दृष्टि से संवेदनशील सड़कों के हिस्सों पर मोबाईल टीम तैनात रखने एवं चेतावनी बोर्ड लगाए जाने के साथ ही सुरक्षा के दृष्टिगत सभी आवश्यक एहतियाती उपाय सुनिश्चित किये जाने पर जोर देते हुए कहा कि जिन जगहों फायर सर्विस की पहॅुच है उनके निकट पानी के रिफिलिंग की व्यवस्था पहले से रखी जाय।
जिलाधिकारी ने कहा कि वनाग्नि नियंत्रण के लिए लीक से हटकर विभिन्न स्तरों पर व्यापक चिंतन-मंथन होना जरूरी है। इसके लिए जिला स्तर के अनुभवों और सुझावों को विशेषज्ञ संगठनों के साथ साझा कर कारगर समाधान तलाश करने की पहल की जा सकती है।
बैठक में प्रभागीय वनाधिकारी डीपी बलूनी ने वनाग्नि के कारण व निवारण के उपायों के साथ ही इससे जुड़ी चुनौतियों व संभावनाओं की जानकारी देते हुए कहा कि वन विभाग के स्तर से वनाग्नि नियंत्रण के साथ ही जान-माल की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि उत्तरकाशी वन प्रभाग में वनाग्नि से जलकर गिरने की कगार पर खडे़ और जान-माल के लिए खतरनाक 574 पेड़ चिन्हित किए गए हैं जिनमें से 78 खतरनाक पेड़ों का सुरक्षित पातन कर दिया गया है। इसी तरह टौंस वन प्रभाग में 427 गिरासू पेड़ चिन्हित कर उनमें से 27 को काटा जा चुका है। प्रभागीय वनाधिकारी अपर यमुना रविन्द्र पुंडीर ने वनाग्नि के प्रभावों और रोकथाम की कार्रवाईयों और सुझावों का प्रस्तुतिकरण करते हुए बताया कि जानमाल के लिए खतरे का सबब बने 48 पेड़ चिन्हित किए गए हैं और 30 पेड़ों का सुरक्षित तरीके से पातन किया जा चुका है।
बैठक में वन निगम के प्रभागीय लौगिंग प्रबंधक श्री बहुगुणा, अग्निनशमन अधिकारी देवेन्द्र सिंह नेगी सहित अन्य अधिकारियों ने भी महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए।

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